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निजी स्कूलों का शिक्षा व्यवसाय: बच्चों के भविष्य का सौदा, अभिभावकों की जेबों पर डाका

निजी स्कूलों का शिक्षा व्यवसाय: बच्चों के भविष्य का सौदा, अभिभावकों की जेबों पर डाका

देहरादून। उत्तराखंड के निजी स्कूलों में शिक्षा अब एक व्यवसाय बन चुकी है, और इसका सबसे बड़ा शिकार हैं हमारे बच्चे और उनके अभिभावक। जैसे ही नया शैक्षिक सत्र शुरू होता है, निजी स्कूलों द्वारा अभिभावकों पर नए-नए खर्चों का बोझ डाला जाता है। सबसे अहम मुद्दा है किताबों को लेकर स्कूलों का दबाव। एनसीआरटी की किताबें, जो कि सरकारी और गुणवत्तापूर्ण होती हैं, अब पर्याप्त नहीं मानी जा रही हैं। निजी स्कूल अब बच्चों को एनसीआरटी के बजाय प्राइवेट पब्लिशर्स की महंगी किताबें खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं। यह केवल एक कदम नहीं, बल्कि पूरी भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है, जिसका मुख्य उद्देश्य मुनाफा कमाना और अभिभावकों की जेबें ढीली करना है।

प्राइवेट स्कूलों का असली मकसद: शिक्षा का व्यवसायीकरण और अभिभावकों की आर्थिक लूट

पिछले कुछ वर्षों में यह स्पष्ट हो गया है कि निजी स्कूलों का मुख्य उद्देश्य अब शिक्षा नहीं, बल्कि मुनाफा कमाना बन चुका है। बच्चों के बेहतर भविष्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात अब केवल एक दिखावा बनकर रह गई है। इन स्कूलों के लिए बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा महत्वपूर्ण है किताबों, ट्यूशन, यूनिफॉर्म, और विभिन्न अनावश्यक शुल्कों के जरिए पैसा कमाना। जब नए सत्र की शुरुआत होती है, तो स्कूलों में हर तरह की किताबों का ‘आवश्यक’ होना बताया जाता है, जिनमें से अधिकांश निजी पब्लिशर्स की महंगी किताबें होती हैं। यही नहीं, इन किताबों का बाजार भी स्कूल संचालकों और पब्लिशर्स के बीच में एक साजिश के तहत चलाया जाता है, जिससे अभिभावकों को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है। एनसीआरटी की किताबें, जो कि शिक्षा का एक सस्ता और प्रभावी तरीका हैं, इन स्कूलों में अब बेमानी साबित हो चुकी हैं। बच्चों को मजबूर किया जाता है कि वे महंगी प्राइवेट किताबें खरीदें, जो कि न केवल पैसों की बर्बादी है, बल्कि यह एक स्पष्ट उदाहरण है कि निजी स्कूलों की प्राथमिकता अब शिक्षा नहीं, बल्कि मुनाफा है।

सरकारी नीतियों की खामियां: शिक्षा के इस भ्रष्ट तंत्र पर चुप्पी क्यों?

यह समझना भी जरूरी है कि निजी स्कूलों के इस भ्रष्ट तंत्र के लिए सरकार की नीतियां भी कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं। जबकि सरकारी स्कूलों में एनसीआरटी की किताबों का पालन किया जाता है, वहीं निजी स्कूलों को पूरी तरह से ‘स्वतंत्रता’ मिल गई है कि वे जो चाहें, बच्चों से वह सामग्री खरीदवा सकते हैं। इस लापरवाह और भ्रष्ट व्यवस्था का खामियाजा अभिभावकों को भुगतना पड़ता है, जो पहले से ही वित्तीय तंगी का सामना कर रहे हैं।

यहां तक कि स्कूल फीस के अलावा, किताबों की खरीददारी, ऑनलाइन ट्यूशन और अन्य शैक्षिक खर्चे अभिभावकों की कमाई पर भारी पड़ रहे हैं। इस व्यवस्था में न तो शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जा रहा है, और न ही बच्चों के भविष्य को प्राथमिकता दी जा रही है। केवल एक ही लक्ष्य है – ज्यादा से ज्यादा मुनाफा। निजी स्कूलों के भ्रष्ट तंत्र का मुकाबला: यह एक साथ उठाए गए कदमों की मांग है यह स्पष्ट है कि उत्तराखंड के निजी स्कूलों में शिक्षा का व्यवसायीकरण पूरी तरह से चरम सीमा पर पहुंच चुका है। सरकार को चाहिए कि वह इस भ्रष्ट व्यवस्था पर कड़ी नजर रखे और बच्चों की शिक्षा के नाम पर होने वाली लूट को रोके। एनसीआरटी की किताबों को अनिवार्य बनाना, और निजी स्कूलों के मनमाने शुल्कों पर कड़ी कार्रवाई करना समय की मांग है।

सरकार को इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि निजी स्कूलों में शिक्षा का खर्च और इसके साथ जुड़े अन्य खर्चों को नियंत्रित किया जाए। इसके साथ ही अभिभावकों को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे अपनी इच्छा के अनुसार बच्चों के लिए शिक्षा सामग्री का चयन कर सकें, न कि स्कूलों द्वारा थोपे गए महंगे विकल्पों को। यह एक जागरूकता की आवश्यकता है, ताकि अभिभावक इस भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ आवाज उठा सकें और बच्चों के भविष्य को सही दिशा में आकार देने के लिए जरूरी कदम उठा सकें।

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