भारत डोगरा
आधुनिक समाज में अनेक स्तरों पर जटिलताएं बढ़ रही हैं। तकनीकी बदलाव तेजी से हो रहे हैं, और सामान्य जनजीवन पर उनका असर बड़े स्तर पर हो रहा है। मोबाइल फोन और सोशल मीडिया को ही लें तो इनका बहुत व्यापक असर हुआ है। दैनिक जीवन को हमने कई स्तरों पर कम समय में ही बदल दिया है। इनमें कुछ असर अच्छे हो सकते हैं, और कुछ बुरे। इस पर बहस हो सकती है, पर एक अधिक व्यापक सच्चाई यह है कि तकनीकी बदलाव में इतनी अधिक तेजी हुई है कि हमें उसे संतुलित और सुलझे हुए रूप में अपनाने के अवसर नहीं मिलते हैं। हम अभी संभलने की क्षमता प्राप्त कर ही रहे होते हैं कि तब तक बहुत कुछ गड़बड़ा जाता है। मुद्दा केवल तकनीकी बदलाव का ही नहीं है, बल्कि इससे आगे यह भी है कि इस बदलाव को विशेष दिशा में धकेलने के प्रयास साथ-साथ होते हैं। ये प्रयास प्राय: किसी भले उद्देश्य से नहीं जुड़े होते हैं अपितु शक्तिशाली और अति साधन-संपन्न तत्वों के अपना मुनाफा, नियंत्रण और आधिपत्य बढ़ाने की संकीर्ण सोच से जुड़े होते हैं। तकनीकी बदलावों के साथ ही लोगों की सोच को और कायरे को प्रभावित करने वाले पुराने स्रेतों का महत्त्व तेजी से कम होने लगता है, जबकि नये स्रेत हावी होने लगते हैं। इस स्थिति में समाज में नैतिकता की जो बहुत महत्त्वपूर्ण स्थिति और पहचान है, वह भी बहुत प्रभावित होती और बदलती है। क्या बुरा है और क्या गलत है, ऐसे बुनियादी सवाल और उनके जवाब नई तरह से प्रभावित होने लगते हैं। ऐसी कई प्रवृत्तियों, जिन्हें सामाजिक बुराई के रूप में मान्यता मिली हुई थी और ऐसी मान्यता मिलना तथ्य आधारित था, को अब बुराई माना ही नहीं जाता। गलत राह से रोकने के लिए जो सोच समाज में मौजूद थी, वही खिसकने लगती है।
इस तरह से एक ओर तो समाज में अनेक बुराइयां तेजी से फैल सकती हैं और इस कारण अनेक नये तनाव और समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इसके साथ-साथ समाज में कई मुद्दों पर अनिश्चय बढऩे की स्थिति आ सकती है। अनिश्चय की इस स्थिति के एक ओर तो अपने तनाव हैं और दूसरी ओर इसमें अनुचित तत्वों को अपना असर बढ़ाने के अधिक अवसर मिलते हैं। अत: ऐसे दौर और समय में रेखांकित करना और जोर देकर कहना बहुत जरूरी हो जाता है कि सामाजिक नैतिकता के अनेक शात तथ्य ऐसे हैं जो सदा महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक थे, आज भी हैं और सदा प्रासंगिक रहेंगे। एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि अपनी भलाई को समाज की भलाई के साथ जोड़ कर ही आगे बढ़ा जाए। इसके लिए जरूरी है कि सभी की भलाई, समाज की भलाई के बारे में सही समझ बनाने का प्रयास किया जाए जो समता, न्याय, अमन-शांति और पर्यावरण रक्षा जैसे बहुत व्यापक मान्यता के प्रतिष्ठित सिद्धांतों पर आधारित हो। अपनी प्रगति के बारे में सोचना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, पर सामाजिक नैतिकता की मांग है कि इस प्रगति की ऐसी राह अपनाई जाए जो सामाजिक भलाई से जुड़ी रहे और किसी भी तरह की सामाजिक क्षति से बचे। स्वयं की प्रगति के लिए, इस प्रगति में तेजी लाने के लिए अपनी क्षमताओं का भरपूर विकास करना उचित है, पर इसके लिए किसी और को क्षति पहुंचाना और समाज को क्षति पहुंचाना अनुचित है।
इस सोच का निष्कर्ष तो यही है कि मेहनत और सच्चाई की जिंदगी ही सबसे उचित जिदंगी है। यह एक शात सत्य है, सामाजिक नैतिकता का बहुत महत्त्वपूर्ण पक्ष है, पर आज इस तरह की बातें बहुत कम सुनी जाती हैं, या कोई फिर भी कह दे, तो कई बार इसे महज उपदेश या ओल्ड फैशन सोच कहा जाता है। इससे यही सिद्ध होता है कि तेज बदलाव के आधुनिक युग में सामाजिक नैतिकता के महत्त्वपूर्ण पक्ष उपेक्षित और आहत ही रहे हैं, पर इससे सामाजिक नैतिकता के महत्त्वपूर्ण और शात पक्षों का महत्त्व कम नहीं होता है। हां, इतना जरूर है कि इन्हें रेखांकित करना, इनकी याद दिलाना पहले से अधिक जरूरी हो गया है।
इसी तरह सामाजिक संबंधों को बहुत ईमानदारी से निभाना सामाजिक नैतिकता का बहुत महत्त्वपूर्ण पक्ष है। इन नजदीकी संबंधों को आपसी गहरे विास के आधार पर बनाए रखना, इस विास को कभी नहीं तोडऩा मानव-जीवन का एक बहुत महत्त्वपूर्ण पक्ष है। गहरे विास पर आधारित यह संबंध अपने आप में बहुत महत्त्वपूर्ण है और साथ में सच्चाई, मेहनत, ईमानदारी पर आधारित जीवन के लिए ऐसे प्रगाढ़ संबंधों से बहुत सहारा भी मिलता है। ऐसे जीवन में कठिनाइयां भी आती हैं और आज के आधुनिक दौर में कई तरह से यह संभावना अधिक बढ़ गई है। अत: सुख-दुख, उतार-चढ़ाव के बीच अपना संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है। कठिनाई और दुख की स्थिति में अपने को संभाल पाना और इसके लिए अपने नैतिक जीवन के आधार से मजबूती प्राप्त करना आवश्यक है। दूसरी ओर अधिक सफलता मिल जाने पर अपने संतुलन को बनाए रखना, अपने नैतिक मार्ग पर दृढ़ रहना और हर तरह के अहंकार और सफलता के अनुचित दोहन से बचना आवश्यक है।
जिस तरह की सामाजिक नैतिकता की जरूरत समाज को सदा रही है और तेज बदलावों के आधुनिक दौर में विशेष तौर पर है, उसे प्रतिष्ठित करने के प्रयास आज बहुत जरूरी हैं पर फिर भी उपेक्षित हैं। दूसरी ओर, इस तरह के चालू प्रवृत्ति के प्रयत्न अधिक देखे जाते हैं जिनमें चालाकी से एक तरह से लोगों को भ्रमित कर किसी असरदार व्यक्ति के नेतृत्व में लाया जाता है और उनकी भावनाओं का दोहन किया जाता है। ऐसे प्रयासों के स्थान पर सही तरह की सामाजिक नैतिकता प्रतिष्ठित हो तो समाज की उचित और संतुलित प्रगति से बहुत मदद मिलेगी।
मौजूदा दौर में अनेक गंभीर समस्याओं के बढऩे का एक व्यापक स्तर का कारण यह है कि इन समस्याओं पर नियंत्रण लगाने वाली जो नैतिकता आधारित मान्यताएं समाज में मौजूद थीं, उनका तेजी से हृास हुआ है। भ्रष्टाचार बढऩे का एक मुख्य कारण यह है तो दूसरी ओर, अन्य संदर्भ में, तरह-तरह के बढ़ते नशे की प्रवृत्ति को समझने के लिए भी इस तरह के बदलाव को समझना पड़ेगा जो बहुत स्पष्ट चाहे नजर न आएं पर बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। महिलाओं के विरुद्ध विशेष तरह की हिंसा और अपराधों को भी इस व्यापक संदर्भ में समझना जरूरी है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि आधुनिकता अपने आप में बुरी है। आधुनिकता के अनेक सार्थक पक्ष भी हैं जो समाज को बेहतर बनाते हैं, या बना सकते हैं। पर समाज में व्यापक स्तर पर समझ बनानी होगी कि आधुनिकता के नाम पर जो कुछ समाज में आ रहा है और तेजी से आ रहा है, उसमें क्या अनुचित है, और क्या उचित है ताकि इस समझ के आधार पर आधुनिकता को हम सुलझे हुए और संतुलित आधार पर अपना सकें।


План эвакуации является обязательным элементом системы противопожарной защиты (ст. 84 123-ФЗ). Графическая часть выполняется по ГОСТ Р 12.2.143-2009 (п. 6.2.1). Размещение плана эвакуации регламентировано п. 7 ППР РФ. При изготовлении планов эвакуации применяются фотолюминесцентные материалы (п. 6.1.12 ГОСТ Р 12.2.143). Для объектов Санкт-Петербурга (план эвакуации СПб) требуется учитывать СП 3.13130.2009 (п. 4.3) по частоте тренировок. Рекомендуется заказать план эвакуации у лицензированных организаций https://fire-axe.ru/ . Возможно купить план эвакуации типового исполнения, но для каждого здания требуется индивидуальный расчет путей эвакуации (ст. 53 123-ФЗ).