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डाककर्मी के पुत्र मुंशी प्रेमचंद ने लिखी साहित्य की नई इबारत – डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव

भारत संवाद। प्रेमचंद के लगभग सभी पात्र कहानियों से निकल कर उपन्यासों से बाहर आकर एक अलग संसार रचते हैं और इन चरित्रों की छाप इतने गहरे उतरती है कि यह हमारे अवचेतन का हिस्सा हो जाते हैं। ‘पंच परमेश्वर’ के अलगू चैधरी और जुम्मन शेख न्याय की निष्पक्षता को एक रुहानी ऊँचाई देते हैं और हामिद के चिमटे में छिपी भावना पूरी ‘ईदगाह’ में बड़े मियाँ के सजदे में झुकने से भी बड़ी इबादत हो जाती है। उक्त उद्गार 31 जुलाई को प्रेमचंद की जयंती पर राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएं और हिंदी साहित्यकार व् ब्लॉगर कृष्ण कुमार यादव ने व्यक्त किये।

निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि डाककर्मी के पुत्र मुंशी प्रेमचंद ने हिन्दी साहित्य में उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी पहचान बनाकर साहित्य की नई इबारत लिखी। जब प्रेमचंद के पिता अजायब राय श्रीवास्तव गोरखपुर में डाकमुंशी के पद पर कार्य कर रहे थे उसी समय गोरखपुर में रहते हुए ही उन्होंने अपनी पहली रचना लिखी। श्री यादव ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद को पढ़ते हुए हम सब बड़े हो गए। उनकी रचनाओं से बड़ी आत्मीयता महसूस होती है। ऐसा लगता है जैसे इन रचनाओं के पात्र हमारे आस-पास ही मौजूद हैं।

डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि आज भूमंडलीकरण के दौर में भी प्रेमचन्द के साहित्यिक और सामाजिक विमर्श उतने ही प्रासंगिक हैं। राष्ट्र आज भी उन्हीं समस्याओं से जूझ रहा है जिन्हें प्रेमचन्द ने काफी पहले रेखांकित कर दिया था। चाहे वह जातिवाद या सांप्रदायिकता का जहर हो, चाहे कर्ज की गिरफ्त में आकर आत्महत्या करता किसान हो, चाहे नारी की पीड़ा हो, चाहे शोषण और समाजिक भेद-भाव हो। उनका साहित्य शाश्वत है और उनकी रचनाएँ यथार्थ के करीब रहकर समय से होड़ लेती नजर आती हैं।

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